यादव जाति की उत्पत्ति

 

पौराणिक ग्रंथों, पाश्चात्य साहित्य, प्राचीन एवं आधुनिक भारतीय साहित्य, उत्खनन से प्राप्त सामग्री तथा विभिन्न शिलालेखों और अभिलेखों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है के यादव जाति के उत्पति के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित है | धार्मिक मान्यताओं एवं हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार यादव जाति का उद्भव पौराणिक राजा यदु से हुई है | जबकि भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य एवं पुरातात्विक सबूतों के अनुसार प्राचीन आभीर वंश से यादव (अहीर) जाति की उत्पति हुई है | इतिहासविदों के अनुसार आभीर का ही अपभ्रंश अहीर है |

हिन्दू महाकाव्य ‘महाभारत’ में यादव एवं आभीर (गोप) शब्द का समानांतर उल्लेख हुआ है | जहाँ यादव को चद्रवंशी क्षत्रिय बताया गया है वहीँ आभीरों का उल्लेख शूद्रों के साथ किया गया है | पौराणिक ग्रन्थ ‘विष्णु पुराण’, हरिवंश पुराण’ एवं ‘पदम् पुराण’ में यदुवंश का विस्तार से वर्णन किया गया है |

यादव वंश प्रमुख रूप से आभीर (वर्तमान अहीर), अंधक, वृष्णि तथा सात्वत नामक समुदायो से मिलकर बना था, जो कि भगवान कृष्ण के उपासक थे। यह लोग प्राचीन भारतीय साहित्य मे यदुवंश के एक प्रमुख अंग के रूप मे वर्णित है। प्राचीन, मध्यकालीन व आधुनिक भारत की कई जातियाँ तथा राज वंश स्वयं को यदु का वंशज बताते है और यादव नाम से जाने जाते है।

जयंत गडकरी के कथनानुसार, ” पुराणों के विश्लेषण से यह निश्चित रूप से सिद्ध होता है कि अंधक, वृष्णि, सात्वत तथा अभीर (अहीर) जातियो को संयुक्त रूप से यादव कहा जाता था जो कि श्रीक़ृष्ण की उपासक थी। परंतु यह भी सत्य है की पुराणो मे मिथक तथा दंतकथाओं के समावेश से इंकार नहीं जा सकता, किन्तु महत्वपूर्ण यह है कि पौराणिक संरचना के तहत एक सुदृढ़ सामाजिक मूल्यो की प्रणाली प्रतिपादित की गयी थी|

लुकिया मिचेलुत्ती के यादवों पर किए गए शोधानुसार

यादव जाति के मूल मे निहित वंशवाद के विशिष्ट सिद्धांतानुसार, सभी भारतीय गोपालक जातियाँ, उसी यदुवंश से अवतरित है जिसमे श्रीक़ृष्ण (गोपालक व क्षत्रिय) का जन्म हुआ था …..उन लोगों मे यह दृढ विश्वास है कि वे सभी श्रीक़ृष्ण से संबन्धित है तथा वर्तमान की यादव जातियाँ उसी प्राचीन वृहद यादव सम समूह से विखंडित होकर बनी हैं।

क्रिस्टोफ़ जफ़्फ़ेर्लोट के अनुसार

यादव शब्द कई जातियो को आच्छादित करता है जो मूल रूप से अनेकों नामों से जाती रही है, हिन्दी क्षेत्र, पंजाब व गुजरात में- अहीर, महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र व कर्नाटक में-गवली, जिनका सामान्य पारंपरिक कार्य चरवाहे, गोपालक व दुग्ध-विक्रेता का था।

लुकिया मिचेलुत्ती के विचार से

यादव लगातार अपने जातिस्वरूप आचरण व कौशल को उनके वंश से जोड़कर देखते आए हैं जिससे उनके वंश की विशिष्टता स्वतः ही व्यक्त होती है। उनके लिए जाति मात्र पदवी नहीं है बल्कि रक्त की गुणवत्ता है, और ये द्रष्टव्य नया नही है। अहीर (वर्तमान मे यादव) जाति की वंशावली एक सैद्धान्तिक क्रम के आदर्शों पर आधारित है तथा उनके पूर्वज, गोपालक योद्धा श्री कृष्ण पर केन्द्रित है, जो कि एक क्षत्रिय थे।

सैन्य वर्ण ( मार्शल रेस )

वर्ष 1920 मे भारत मे अंग्रेज़ी हुकूमत ने यदुवंशी अहीर जाति को सैन्य वर्ण ( मार्शल रेस ) के रूप मे सेना मे भर्ती हेतु मान्यता दी, जबकि पहले से ही सेना मे उनकी भर्ती होती आ रही थी तथा अहीर सैनिको की 4 कंपनियाँ बनाई गयीं। भारत- चीन युद्ध के दौरान यादव सैनिकों का पराक्रम व बलिदान भारत मे आज तक सरहनीय माना जाता है।

यादव’ शब्द अनेकों पारंपरिक जातियो के समूह से बना है, जैसे कि ‘ हिन्दी भाषी क्षेत्र’ के ‘अहीर’, महाराष्ट्र के ‘गवली’, आंध्र प्रदेश के ‘ग्वाला’ तथा तमिलनाडू के कोनार। हिन्दी भाषी क्षेत्रों मे अहीर,ग्वाला(गवली) तथा यादव शब्द प्रायः एक दूसरे के पर्याय माने जाते है।.] कुछ वर्तमान राजपूत वंश भी स्वयं के यादव होने का दावा करते है, तथा वर्तमान यादव भी खुद को क्षत्रिय मानते है यादव मुख्यतया यदुवंशी, नंदवंशी व ग्वालवंशी उपजातीय नामो से जाने जाते है, अहीर समुदाय के अंतर्गत 20 से भी अधिक उपजातीया सम्मिलित हैं। वे प्रमुखतय ऋषि गोत्र अत्री से है तथा अहीर उपजातियों मे अनेकों कुल गोत्र है जिनके आधार पर सगोत्रीय विवाह वर्जित है।

Yadav Maha Janapad – यादव महाजनपद

महाजनपद
महाजनपद प्राचीन भारत मे राज्य या प्रशासनिक इकाईयों को कहते थे । उत्तर वैदिक काल में कुछ जनपदों का उल्लेख मिलता है । बौद्ध ग्रंथों में इनका कई बार उल्लेख हुआ है ।
गणना और स्थिति
ईसा पूर्व छठी सदी में वैयाकरण पाणिनी ने 22 महाजनपदों का उल्लेख किया है । इनमें से तीन – मगध, कोसल तथा वत्स को महत्वपूर्ण बताया गया है ।
आरंभिक बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में इनके बारे में अधिक जानकारी मिलती है । यद्यपि कुल सोलह महाजनपदों का नाम मिलता है पर ये नामाकरण अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न हैं । इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि ये अन्तर भिन्न-भिन्न समय पर राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के कारण हुआ है । इसके अतिरिक्त इन सूचियों के निर्माताओं की जानकारी भी उनके भौगोलिक स्थिति से अलग हो सकती है । बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय , महावस्तु मे 16 महाजनपदों का उल्लेख है-
·         अवन्ति – आधुनिक मालवा का प्रदेश जिसकी राजधानी उज्जयिनी और महिष्मति थी ।
·         अश्मक या अस्सक – नर्मदा और गोदावरी नदियों के बीच अवस्थित इस प्रदेश की राजधानी पाटन थी ।
·         अंग – वर्तमान के बिहार के मुंगेर और भागलपुर जिले । इनकी राजधानी चंपा थी ।
·         कम्बोज – पाकिस्तान का हजारा जिला ।
·         काशी – इसकी राजधानी वाराणसी थी ।
·         कुरु – आधुनिक हरियाणा तथा दिल्ली का यमुना नदी के पश्चिम वाला अंश शामिल था । इसकी राजधानी आधुनिक दिल्ली (इन्द्रप्रस्थ) थी ।
·         कोशल – उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिला, गोंडा और बहराइच के क्षेत्र शामिल थे । इसकी राजधानी श्रावस्ती थी ।
·         गांधार – पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र । इसे आधुनिक कंदहार से जोड़ने की गलती कई बार लोग कर देते हैं जो कि वास्तव में इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था ।
·         चेदि – वर्तमान में बुंदेलखंड का इलाका ।
·         वज्जि या वृजि – आठ गणतांत्रिक कुलों का संघ जिसकी प्रदेश उत्तर बिहार में गंगा के उत्तर में था तथा जिसकी राजधानी वैशाली थी ।
·         वत्स या वंश – आधुनिक उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तथा मिर्ज़ापुर जिले ।
·         पांचाल – पश्चिमी उत्तर प्रदेश । इसकी राजधानी अहिच्छत्र थी ।
·         मगध – आधुनिक पटना तथा गया जिले और आसपास के क्षेत्र ।
·         मत्स्य या मच्छ – इसमें राजस्थान के अलवर, भरतपुर तथा जयपुर जिले के क्षेत्र शामिल थे ।
·         मल्ल – यह भी एक गणसंघ था और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके इसके क्षेत्र थे ।
·         सुरसेन या शूरसेन – इसकी राजधानी मथुरा थी ।
ये सभी महाजनपद ई० पू० 600 से ई० पू० 300 के बीच आज के उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से बिहार तक और हिन्दुकूश से गोदावरी नदी तक में फैला हुआ था । दीर्घ निकाय के महागोविंद सुत्त में भारत की आकृति का वर्णन करते हुए उसे उत्तर में आयताकार तथा दक्षिण में त्रिभुजाकार यानि एक बैलगाड़ी की तरह बताया गया है । बौद्ध निकायों में भारत को पाँच भागों में वर्णित किया गया है – उत्तरापथ (पश्चिमोत्तर भाग), मध्यदेश, प्राची (पूर्वी भाग) दक्षिणापथ तथा अपरांत (पश्चिमी भाग) का उल्लेख मिलता है । इससे इस बात का भी प्रमाण मिलता है कि भारत की भौगोलिक एकता ईसापूर्व छठी सदी से ही परिकल्पित है । इसके अतिरिक्त जैन ग्रंथ भगवती सूत्र और सूत्र कृतांग, पाणिनी की अष्टाध्यायी, बौधायन धर्मसूत्र (ईसापूर्व सातवीं सदी में रचित) और महाभारत में उपलब्ध जनपद सूची पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि उत्तर में हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा पष्चिम में गांधार प्रदेश से लेकर पूर्व में असम तक का प्रदेश इन जनपदों से आच्छादित था । कौटिल्य ने एक चक्रवर्ती सम्राट के अन्तर्गत संपूर्ण देश की रादनीतिक एकता की परिकल्पना की थी । ईसापूर्व छठी सदी से ईसापूर्व दूसरी सदी तक प्रचलन में रहे आहत सिक्को के वितरण से अन्देशा होता है कि ईसापूर्व चौथी सदी तक सम्पूर्ण भारत में एक ही मुद्रा प्रचलित थी । इससे उस युग में भारत के एकीकरण की साफ़ झलक दिखती है ।